“150 साल का सफर: वंदे मातरम् कैसे बना आज़ादी का सबसे बड़ा नारा”

वंदे मातरम् : आज़ादी का अमर गीत और भारत का राष्ट्रीय गर्व

भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात हो और “वंदे मातरम्” का ज़िक्र न आए, यह संभव ही नहीं। यह गीत केवल शब्दों का मेल नहीं, बल्कि एक ऐसी आत्मिक शक्ति है जिसने भारतवासियों के दिलों में आज़ादी का जुनून जगाया। इस साल “वंदे मातरम्” की रचना के 150 साल पूरे हो रहे हैं, और यह अवसर हमें इसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता को याद दिलाता है।

वंदे मातरम हिंदू अनुवाद

 

वंदे मातरम् का इतिहास

इस गीत की रचना महान साहित्यकार बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने 1875 के आसपास अपने उपन्यास आनंदमठ में की थी। बाद में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसकी धुन बनाई।

पहली बार यह गीत 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया।

14 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि, जब संविधान सभा की पहली बैठक हुई, उसका प्रारंभ “वंदे मातरम्” से ही हुआ।

यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों के लिए नारा और प्रेरणा दोनों बन गया।

 

श्रीअरविंद घोष का गद्य भावानुवाद

योगी और दार्शनिक श्रीअरविंद घोष ने वंदे मातरम् का यह अद्भुत गद्य भावानुवाद प्रस्तुत किया था:

“हे मां। तेरी धरती जल से भरपूर है, फल-फूल से लदी हुई है, मलय पर्वत की ठंडी सुगंध से शीतल है, खेतों में लहलहाती फसल से आच्छादित है। तेरी रातें चांदनी से नहाकर पुलकित हो उठती हैं और वृक्ष खिले फूलों व पत्तों से सजे रहते हैं। तू मुस्कान बिखेरने वाली, मधुर वाणी बोलने वाली, सुख देने वाली है। तेरे करोड़ों पुत्रों के गले से उठी आवाज गगन में गूंजती है और करोड़ों भुजाओं में तलवारें और अस्त्र-शस्त्र चमकते हैं। कौन कहता है कि तू निर्बल है, मां? तू अपार शक्ति है, संकट से पार लगाने वाली है और शत्रुओं का नाश करने वाली है। तू ही ज्ञान है, धर्म है, हृदय में है और तू ही जीवन का सार है। तू प्राण है, भुजाओं की शक्ति है और हृदय की भक्ति है। हम तुझे ही पूजते हैं, हे मां! तू ही दसों अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली मां दुर्गा है, कमल के आसन पर विराजमान मां लक्ष्मी है। तू मां सरस्वती है, हे निर्मल मां! मैं तुझे प्रणाम करता हूं।”

यह भावानुवाद दिखाता है कि वंदे मातरम् सिर्फ़ मातृभूमि का गुणगान नहीं, बल्कि भारत माता को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में देखने की भावभूमि है।

वंदे मातरम् का राष्ट्रीय महत्व

1. यह गीत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्राण मंत्र रहा।

2. इसने युवाओं में देशभक्ति और त्याग का भाव जाग्रत किया।

3. यह भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता प्राप्त है।

4. वंदे मातरम् गाते हुए असंख्य क्रांतिकारियों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

 

भारत की सुरक्षा और लोकतंत्र का उत्सव

आज जब भारत चुनाव आयोग की स्थापना के 75 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है, तो यह लोकतंत्र की ताकत का प्रतीक है। स्वतंत्र भारत की नींव जिस गीत की शक्ति से मजबूत हुई, वही गीत आज भी हमें एकता और राष्ट्रभक्ति का संदेश देता है।

वंदे मातरम् का अमर संदेश

“वंदे मातरम्” केवल आज़ादी का नारा नहीं, बल्कि यह संदेश देता है कि—

मातृभूमि ही सर्वोच्च है।

उसकी रक्षा करना हर नागरिक का धर्म है।

भारत माता सिर्फ़ एक भूखंड नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, अध्यात्म और शक्ति का प्रतीक है।

 

निष्कर्ष

आज जब हम वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने का उत्सव मना रहे हैं, तो यह सिर्फ़ एक गीत की जयंती नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय चेतना का उत्सव है। यह गीत हर भारतीय के दिल में आज भी गूंजता है और हमेशा गूंजता रहेगा—

“वंदे मातरम्!”

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